मध्यप्रदेश….
पर्वत की ऊँचाइयाँ फतह करने वाली पर्वतारोही मेघा परमार अब समाज में शिक्षा की नई ऊँचाइयाँ छूने का संकल्प लेकर निकली हैं। अपने साहस और समर्पण से उन्होंने जो नाम कमाया, अब उसी ऊर्जा के साथ वे ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का दीप जला रही हैं।
मेघा ने अपनी इस यात्रा की शुरुआत उस विचार से की कि — “अगर हर गांव में एक बच्चा पढ़ जाएगा, तो पूरा समाज आगे बढ़ जाएगा।”

उनका मानना है कि संवाद और शिक्षा ही वो दो शक्तियाँ हैं जो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण के दौरान वे माता-पिता से संवाद करती हैं, बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करती हैं और किशोरियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए जागरूक करती हैं। उनके इस अभियान में स्थानीय शिक्षक, पंचायत प्रतिनिधि और युवा स्वयंसेवक भी सक्रिय सहयोग दे रहे हैं।

मेघा बताती हैं कि पर्वतारोहण ने उन्हें सिखाया कि कठिन रास्तों पर भी निरंतर प्रयास से मंज़िल मिलती है — ठीक वैसे ही शिक्षा भी जीवन का वह शिखर है जिसे हर बच्चे को छूना चाहिए।
उनकी प्रेरक कहानियाँ सुनकर बच्चे उत्साहित होते हैं और माता-पिता भी अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। इस अभियान का उद्देश्य केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण समाज में “सीखने की संस्कृति” विकसित करने का प्रयास है।

मेघा कहती हैं — “शिक्षा सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि सोच में बदलाव लाती है। जब सोच बदलेगी, तभी समाज बदलेगा।”
आज जहाँ कई जगह शिक्षा तक पहुँच अभी भी चुनौती बनी हुई है, वहीं मेघा परमार जैसी युवतियाँ समाज में नई दिशा दिखा रही हैं। उनके इस अभियान को देखकर लोग न केवल प्रेरित हो रहे हैं, बल्कि अपने गाँवों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने का संकल्प भी ले रहे हैं।

इस “शिक्षा जागरूकता यात्रा” के माध्यम से मेघा ने यह साबित कर दिया है कि असली पर्वत वही हैं जिन्हें हम अपने भीतर जीतते हैं — और सबसे ऊँचा पर्वत है अज्ञानता का शिखर, जिसे शिक्षा की रोशनी से जीतना ही असली विजय है।















