इंदौर….
हौसलों से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। इसे साबित किया है लोहार पट्टी निवासी 24 वर्षीय दृष्टिहीन युवा अक्षत बल्दवा ने। हिंदी माध्यम से पढ़े अक्षत ने बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) से बीए एलएलबी ऑनर्स की डिग्री हासिल की है।
हाल ही में हुए दीक्षांत समारोह में जब अक्षत ने मंच पर डिग्री ग्रहण की, तो मां मीना बल्दवा की आंखें खुशी से नम हो उठीं। इस पल के साक्षी उनके पिता, बहन-जीजा और मामा भी बने।
अक्षत कहते हैं- ‘मेरी इस यात्रा में मां का त्याग सबसे बड़ा है। कोविड के बाद नवंबर 2021 में जब मैं बेंगलुरु आया, तो मां ने परिवार छोड़कर मेरे साथ रहने का निर्णय लिया।’ कॉलेज से 200 मीटर दूर किराए के छोटे कमरे में रहकर मां ने बेटे की पढ़ाई आसान बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की।
क्लैट की तैयारी के दौरान कोचिंग के नोट्स को स्कैन कर डिजिटल फाइल बनातीं ताकि अक्षत उन्हें ओसीआर ऐप से पढ़ सके। मीना बताती हैं, दृष्टिहीनों के लिए सुविधाएं न देखकर वहीं रहने लगीं। उन्होंने अक्षत के साथ उसके 20 सहपाठियों के लिए भी मात्र 60 रु. में लंच बनाकर मदद की।
2020 में अक्षत ने क्लैट में ऑल इंडिया 1118 रैंक और दिव्यांग श्रेणी में तीसरी रैंक हासिल की। उन्हें एनएलएसआईयू में दाखिला मिला और वे हार्वर्ड लॉ स्कूल के सर्टिफिकेट कोर्स के लिए चुने गए 30 छात्रों में शामिल हुए।
‘मेरे जैसे लोग बड़े सपने देखें, उन्हें पूरा करने की हिम्मत जुटाएं’….
डिग्री पूरी करने के बाद अक्षत अब बेंगलुरु में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं। उनका सपना प्रशासनिक सेवा में जाकर देश के सिस्टम में बदलाव लाना है। अक्षत कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि मेरे जैसे लोग बड़े सपने देखें और उन्हें पूरा करने की हिम्मत जुटाएं। आज भी समाज और कई सरकारी-निजी संस्थानों में हमारे प्रति संवेदनशीलता की कमी और भेदभाव है। मेरा लक्ष्य है कि इस भेदभाव को खत्म किया जाए।’
डेढ़ महीने की उम्र में आंखों ने साथ छोड़ा….
अक्षत के संघर्ष की शुरुआत जन्म के कुछ ही समय बाद हो गई थी। डेढ़ महीने की उम्र में उनकी आंखों में जेनेटिक ट्यूमर (कैंसर) हो गया। खून आने लगा। परिवार ने दिल्ली, चेन्नई, पुणे और अहमदाबाद तक इलाज करवाया। कैंसर तो खत्म हो गया लेकिन रोशनी हमेशा के लिए चली गई। अक्षत साइंस नहीं पढ़ सके, लेकिन आर्ट्स लेकर उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।















