खातेगांव….
देवास की विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988) ने प्रधानमंत्री आवास योजना में भ्रष्टाचार के एक मामले में फैसला सुनाया है। न्यायालय ने सोनगांव ग्राम पंचायत के तत्कालीन रोजगार सहायक प्रदीप उपाध्याय को दोषी ठहराते हुए दो अलग-अलग धाराओं में चार-चार की और जुर्माने की सजा सुनाई है। यह निर्णय विशेष न्यायाधीश उमाशंकर अग्रवाल ने पारित किया।
पीएम आवास योजना में भ्रष्टाचार पर सख्त फैसला
अभियोजन के अनुसार, फरियादी तोताराम मीणा के प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान निर्माण के लिए 1 लाख 50 हजार रुपए स्वीकृत हुए थे। इसमें से 1 लाख 20 हजार रुपए का भुगतान पहले ही हो चुका था। शेष 30 हजार रुपए की राशि जारी करने के बदले आरोपी प्रदीप उपाध्याय ने 5 हजार रुपए की रिश्वत की मांग की थी।
पीड़ित ने लोकायुक्त उज्जैन में की थी शिकायत
रिश्वत की मांग से परेशान होकर तोताराम मीणा ने लोकायुक्त उज्जैन में शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त पुलिस ने जांच और सत्यापन के बाद कार्रवाई करते हुए आरोपी प्रदीप उपाध्याय को रंगे हाथों पकड़ा। विवेचना में यह पुष्टि हुई कि आरोपी ने अपने पद का दुरुपयोग कर अवैध फायदा लेने का प्रयास किया था।
कोर्ट ने 20 हजार का जुर्माना लगाया
न्यायालय ने आरोपी प्रदीप उपाध्याय को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत दोषी पाया। दोनों धाराओं में उसे अलग-अलग 4-4 साल का कठोर कारावास और 10-10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जुर्माना अदा न करने पर अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा और दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
कोर्ट ने कहा-जनकल्याणकारी योजनाओं में रिश्वतखोरी एक गंभीर अपराध
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि गरीब हितग्राहियों से जुड़ी जनकल्याणकारी योजनाओं में रिश्वतखोरी एक गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में कठोर दंड देना आवश्यक है, ताकि लोकसेवकों में जवाबदेही बनी रहे और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता कायम रहे।
इस मामले की विवेचना लोकायुक्त पुलिस उज्जैन द्वारा की गई थी। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराया। इस फैसले को सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है।















