भोपाल…. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में भ्रष्टाचार की रोज एक शिकायत लोकायुक्त पहुंच रही है। लोकायुक्त से इसे परीक्षण के लिए विभाग को भेजा जाता है। विभाग अपनी ओर से जांच कर प्रतिवेदन देता है। लेकिन, विभागीय अधिकारी जांच में ऐसी गड़बड़ियां कर रहे हैं कि इसका फायदा आरोपियों को मिल जाता है।
इसके चलते हाल में लोकायुक्त ने विभाग के डायरेक्टर छोटे सिंह की पेशी लगा दी। इसमें पता चला कि जांच ही सही तरीके से नहीं हुई। इसके बाद छोटे सिंह ने उच्च स्तर पर चर्चा करने के बाद जांच के लिए एसओपी (गाइडलाइन) बना दी है।
इसके दायरे में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा परिषद), आजीविका मिशन, विकास आयुक्त कार्यालय, ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण और आरईएस भी आएंगे। दूसरे विभाग भी जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल कर सकेंगे।
दो बड़े मामले: आरोपियों को गलत जांच का फायदा मिला
केस 1. एक केस, दो जांच, अलग-अलग रिकवरी
सिवनी में सरपंच-सचिवों पर आरोप है कि उन्होंने काम किए बिना 13 लाख रु. खाते से निकाल लिए। लोकायुक्त में शिकायत हुई। लोकायुक्त ने विभाग को परीक्षण के लिए भेजा। दो अधिकारी अलग-अलग समय जांच के लिए गए। एक ही गड़बड़ी पर अलग-अलग रिकवरी निकाल दी। इसे आधार बनाकर आरोपी कोर्ट चले गए। लोकायुक्त ने विभाग से पूछ लिया, ये डुप्लीकेसी क्यों, आपका अधिकारी तो इन्वॉल्व नहीं?
केस 2. गलत वेतन निर्धारण, आरोपी रिटायर भी हो गए
आरोप है कि मुरैना जिले में दो पंचायत समन्वय अधिकारी और एक लेखा अधिकारी ने अधीनस्थों का वेतन ही गलत निर्धारित कर दिया। इससे लाखों के नुकसान का आरोप है। 4 साल तक मामला फाइलों में घूमता रहा। आरोपी रिटायर हो गए। लोकायुक्त से मिली शिकायत की जांच ही सही तरीके से नहीं की गई। अब इन रिटायर्ड अधिकारियों पर रिकवरी निकाली गई है, लेकिन रिटायरमेंट के बाद कार्रवाई के लिए विभाग को कैबिनेट तक जाना होगा।
लोकायुक्त से विभाग को जांच के लिए जो भी शिकायतें मिलती थीं, उसमें काफी गड़बड़ी थी। इसी को सुधारने के लिए एसओपी बनाई है। एक बार जांच के जो भी बिंदु तय हो गए, उससे बाहर कुछ नहीं होगा। – छोटे सिंह, डायरेक्टर, पंचायत एवं ग्रामीण विकास
एसओपी के प्रमुख बिंदु
जांच के बिंदु लिखित में तय किए जाएं। जांच अधिकारी तय हो और समय सीमा भी तय की जाए। {निर्माण या उसकी क्वालिटी की जांच होनी है तो तकनीकी विशेषज्ञ जरूर शामिल हों। {आर्थिक मामला हो तो साथ में अकाउंटिंग का एक्सपर्ट रहे। {जिसकी जांच हो रही है, हर तथ्यात्मक फाइंडिंग पर उसका जवाब रिपोर्ट में होना चाहिए। {जिला पंचायत के सीईओ की टीप उसमें होनी चाहिए। {तय अवधि में जांच रिपोर्ट लोकायुक्त, विभाग या शासन को पहुंचना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो जवाबदेही भी उसी समय तय हो। (नोट – अभी किसी भी चीज का पालन नहीं हो रहा था। बेतरतीब ढंग से जांच हो रही थी।)
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