भोपाल….
सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज को बनाया अध्यक्ष….
सरकार की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रसाद देसाई को इस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। जस्टिस रंजना देसाई ने ही उत्तराखंड में यूसीसी का ड्राफ्ट तैयार करने वाली समिति का नेतृत्व किया था। कमेटी को अपनी विस्तृत रिपोर्ट और ड्राफ्ट बिल तैयार करने के लिए 60 दिन का समय दिया गया है।
यह समिति प्रदेश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित ड्राफ्ट तैयार करेगी। इसमें आम जनता, धार्मिक संगठनों और विशेषज्ञों से भी सुझाव और आपत्तियां ली जाएंगी। कमेटी के एजेंडे में विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का संरक्षण, समानता और ‘लिव-इन’ संबंधों के रजिस्ट्रेशन जैसे संवेदनशील मुद्दे भी शामिल किए गए हैं।
ये होंगे कमेटी के सदस्य….
| क्र. | नाम | पद/कार्यक्षेत्र | कमेटी में भूमिका |
| 1 | न्यायमूर्ति रंजना प्रसाद देसाई | सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय | अध्यक्ष |
| 2 | शत्रुघ्न सिंह | सेवानिवृत्त आईएएस (भा.प्र.से.) | सदस्य |
| 3 | अनूप नायर | कानूनविद | सदस्य |
| 4 | गोपाल शर्मा | शिक्षाविद | सदस्य |
| 5 | बुधपाल सिंह | सामाजिक कार्यकर्ता | सदस्य |
| 6 | अजय कटेसरिया | अपर सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग | सचिव |
क्यों पड़ी कमेटी बनाने की जरूरत…?
सरकार के मुताबिक, वर्तमान में विवाह, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत और पारिवारिक कानून प्रभावी हैं। इन नियमों में एकरूपता न होने से कई बार विसंगतियां पैदा होती हैं। शासन का मानना है कि आधुनिक दौर में एक ऐसे संतुलित और व्यावहारिक कानूनी ढांचे की जरूरत है, जो सभी नागरिकों के लिए समान हो। इससे न केवल न्याय की प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि कानूनी स्पष्टता भी बढ़ेगी।
कमेटी के पास 3 बड़े ‘टास्क’….
यह हाईपावर कमेटी केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे तीन मुख्य काम सौंपे गए हैं।
- मध्य प्रदेश में लागू व्यक्तिगत कानूनों (विवाह, तलाक, गोद लेना आदि) का गहराई से विश्लेषण करना।
- उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों ने यूसीसी को लेकर जो मॉडल अपनाए हैं, कमेटी उनकी खूबियों को समझेगी।
- एमपी की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति को देखते हुए एक ऐसा कानून प्रस्तावित करना जो हर वर्ग के लिए व्यावहारिक हो।
‘ लिव-इन’ रिलेशनशिप और बच्चों के हक पर खास फोकस….
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तावित कानून में ‘लिव-इन’ संबंधों के नियमन और उनके रजिस्ट्रेशन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इससे पैदा होने वाले अधिकारों और दायित्वों को लेकर समिति ठोस सुझाव देगी। इसके अलावा, समिति का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करना है। समिति इस बात का भी ख्याल रखेगी कि प्रस्तावित विधेयक का क्रियान्वयन (Implementation) सरल हो और भविष्य में कोई कानूनी जटिलता पैदा न हो।













