भोपाल….
गांव में तालाब की जरूरत हो या न हो, नाली का काम जरूरी हो या नहीं, अब सिर्फ रोजगार देने के लिए एक जैसे कामों के प्रस्ताव मंजूर नहीं होंगे। केंद्र सरकार ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी योजना वीबीजीरामजी (विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन) के जरिए पंचायतों के लिए “एक ही नुस्खा सब पर” वाली व्यवस्था खत्म करने जा रही है।
एक जुलाई से लागू होने वाली इस योजना में हर पंचायत की जरूरत, संसाधन, भौगोलिक स्थिति और विकास स्तर का आकलन कर उसे अलग-अलग श्रेणी में रखा जाएगा। इसके बाद उसी के अनुरूप विकास कार्यों को मंजूरी मिलेगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने संशोधित गाइडलाइन राज्यों को भेज दी है और सुझाव भी मांगे हैं।
जानिए किस श्रेणी में आएगी आपकी पंचायत….
श्रेणी ए: पूर्ण विकसित
मूल स्थिति: यहां पक्की सड़कें, बिजली, पानी और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहले से ही मौजूद हैं। बदलाव का फोकस: अब तालाब निर्माण जैसे कच्चे कामों की जगह आजीविका बढ़ाने वाले स्थाई विकास कार्यों को प्राथमिकता मिलेगी। प्रमुख कार्य: स्वयं सहायता समूहों के लिए बाजार, कस्टम हायरिंग सेंटर और आधुनिक कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
श्रेणी बी: विकासशील
मूल स्थिति: यहां मनरेगा के तहत काम तो हुए हैं, लेकिन पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी के साथ पानी और पलायन की समस्या है। बदलाव का फोकस: श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के साथ-साथ स्थाई बुनियादी ढांचे के निर्माण पर जोर रहेगा। प्रमुख कार्य: जल संरक्षण से जुड़े पक्के निर्माण और नई सड़कों का जाल बिछाकर इन्हें ‘ए’ श्रेणी में लाया जाएगा।
श्रेणी सी: सबसे पिछड़ी
मूल स्थिति: इसमें अधिक बीपीएल परिवार, कम उपजाऊ जमीन, गंभीर जल संकट और पलायन वाले जनजातीय या पहाड़ी इलाके आएंगे। बदलाव का फोकस: विषम भौगोलिक स्थितियों को सुधारने और ग्रामीणों को गांव में ही 125 दिन का सुनिश्चित रोजगार देने का लक्ष्य है। प्रमुख कार्य: पानी सहेजने के लिए चेकडैम बनाने सहित बड़े पैमाने पर भूमि सुधार और पौधरोपण किया जाएगा।
केंद्र के साथ-साथ राज्य को भी लगाना होगा पैसा….
नई व्यवस्था में सिर्फ कामों का स्वरूप ही नहीं बदलेगा, बल्कि फंडिंग का मॉडल भी बदल जाएगा। मनरेगा में जहां अधिकांश खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी, वहीं वीबीजीरामजी योजना में केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात में खर्च साझा किया जाएगा। यानी अब वीबी जी राम जी में राज्यों को भी 40% बजट देना पड़ेगा। इसका सीधा असर पंचायतों की कार्ययोजना पर पड़ेगा। अब किसी पंचायत को अपनी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप ही प्रस्ताव तैयार करने होंगे।














