नई दिल्ली….
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुनाफा कमाने के लिए प्राइवेट यूनिवर्सिटी नहीं चलाई जा सकतीं। इनका मकसद शिक्षा से जुड़े सार्वजनिक लक्ष्य को पूरा करना होना चाहिए।
इन संस्थानों को सिर्फ मुनाफा कमाने वाले बिजनेस की तरह चलने की परमिशन नहीं दी जा सकती। यह बात जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने गुरुवार को कही।
कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 6 हफ्ते में यूनिवर्सिटीज के ऑडिटेड खाते जमा करने को कहा गया है। इन खातों में सरप्लस आय, खर्च, फीस वसूली और कर्मचारियों की सैलरी की जानकारी देनी होगी।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दाखिले, भर्ती और पढ़ाई के स्तर से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी। यह आदेश एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले में दिया गया है।
इसमें एक छात्रा ने कॉलेज रिकॉर्ड में नाम बदलने की मांग की थी, जिसके बाद उसे परेशान किया गया। अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।
फीस, स्टाफ और खर्च की जानकारी मांगी…
अदालत ने यूनिवर्सिटी में दाखिले के समय और कोर्स के दौरान अलग-अलग मदों में ली गई फीस का ब्योरा मांगा है। इसमें टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ की भर्ती के लिए जिम्मेदार बोर्ड की जानकारी भी शामिल है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कर्मचारियों की सैलरी, दूसरे भुगतान और उनकी सेवा शर्तों की जानकारी भी देनी होगी। सभी यूनिवर्सिटी को जुटाए गए फंड, उसके इस्तेमाल और यूनिवर्सिटी से सीधे जुड़े नहीं होने वाले लोगों को किए गए भुगतान की ऑडिटेड रिपोर्ट देनी होगी।
यूनिवर्सिटी को केंद्र या राज्य सरकारों से मिली सभी सुविधाओं और लाभों की जानकारी भी देनी होगी। इसमें जमीन आवंटन और कानूनी छूट से जुड़े लाभ शामिल हैं।
अदालत ने कहा कि सरप्लस फंड का इस्तेमाल कैसे किया गया, इसकी जानकारी भी देनी होगी। इन फंड्स से किए गए निवेश का ब्योरा भी खास तौर पर देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जानकारी छिपाने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्हें कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर संबंधित यूनिवर्सिटी से सभी जानकारी लेने को कहा गया है।
एडमिशन और पढ़ाई के स्तर पर भी निगरानी…
अदालत ने यूनिवर्सिटीज की एडमिशन प्रोसेस और पढ़ाई के स्तर पर भी जानकारी मांगी है। इसमें दाखिले, प्रश्नपत्र तैयार करने और उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के लिए जिम्मेदार लोगों का ब्योरा शामिल है।
यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट की इन कामों में भूमिका की जानकारी भी देनी होगी। इसके अलावा, पिछले एक साल में प्रोफेसर्स को दिए गए टीचिंग आवर्स और उनके जरिए वास्तव में ली गई क्लास की जानकारी देनी होगी।
अदालत ने इस निर्देश का कारण बताते हुए कहा, “हम जानना चाहते हैं कि छात्रों को नुकसान से बचाने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई थी या नहीं।”
मामला एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़ा…
यह मामला एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़ा है। एक छात्रा ने कॉलेज रिकॉर्ड में अपना नाम बदलने की मांग की थी। इसके बाद उसे परेशान किए जाने का मामला सामने आया।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल इस मामले पर सुनवाई शुरू की थी। नवंबर 2025 में अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को व्यापक निर्देश दिए थे।
साथ ही यूनिवर्सिटी बनने की प्रक्रिया, उन्हें दिए गए लाभ और रेगुलेटर की जानकारी मांगी थी कि वे “नो प्रॉफिट, नो लॉस” नियम का पालन करें।
पूर्व अधिकारी ने बताई चिंताएं…
अदालत को पूर्व इंडियन लीगल सर्विस अधिकारी आरएम शर्मा ने इन निर्देशों में मदद की। वह इस मामले में एमिकस क्यूरी के तौर पर अदालत की सहायता कर रहे हैं।
उन्होंने अब तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मिली जानकारी को मिलाकर कुछ चिंताएं बताईं। इनमें दाखिला, शिकायत निवारण और “नो प्रॉफिट, नो लॉस” नियम से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
नियामक संस्थाओं से निरीक्षण की जानकारी मांगी…
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन, नेशनल डेंटल कमीशन, इंडियन नर्सिंग काउंसिल, कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, फार्मेसी काउंसिल, वेटरिनरी काउंसिल और नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन समेत सभी नियामक संस्थाओं को निर्देश दिए।
इन संस्थाओं को संबद्धता से जुड़े कॉलेज निरीक्षणों की जानकारी देनी होगी। उन्हें पूरे फैकल्टी और सपोर्टिंग स्टाफ का डेटाबेस भी जमा करना होगा।
नियामक संस्थाओं को निरीक्षण के दौरान मिली कमियों की जानकारी भी देनी होगी। उन्हें यह भी बताना होगा कि संबंधित यूनिवर्सिटी या संस्थान ने इन कमियों को दूर किया है या नहीं।
जांच में सहयोग के निर्देश…
अदालत की मदद IPS अधिकारी और जम्मू-कश्मीर के पूर्व DGP अशोक प्रसाद की अध्यक्षता वाली समिति ने भी की। उन्हें याचिका करने वाली छात्रा के साथ हुई घटना की शुरुआती जांच करने को कहा गया था।
समिति को एमिटी यूनिवर्सिटी से संपर्क कर सबूत जुटाने का जिम्मा भी दिया गया था। प्रसाद ने अदालत को बताया कि कई बार याद दिलाने के बावजूद कई गवाह बयान देने के लिए सामने नहीं आ रहे हैं।
इसके बाद अदालत ने यूनिवर्सिटी और सभी संबंधित अधिकारियों को जांच में सहयोग करने का व्यापक निर्देश दिया। समिति को अगली सुनवाई की तारीख तक अंतिम रिपोर्ट जमा करने को कहा गया है।
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का निर्देश…
स्टूडेंट की वकील चारु माथुर ने अदालत को बताया कि उसे रोज परेशान किया जा रहा है। उसके खिलाफ अपमानजनक और मानहानिकारक सोशल मीडिया पोस्ट ऑनलाइन शेयर किए जा रहे हैं।
मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने छात्रा को सुरक्षा दी। अदालत ने केंद्र सरकार को सभी आपत्तिजनक लिंक हटवाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।














